वादों की सरकार, नतीजों की कमी: उत्तराखंड में भरोसे का संकट
उत्तराखंड में भाजपा सरकार के वादों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई अब खुलकर सामने है।
कानून-व्यवस्था हो, अभियोजन की गति हो या विकास के बड़े-बड़े दावे—हर मोर्चे पर सवाल खड़े हैं।
सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक एक ही आवाज़ गूंज रही है: वादे बहुत, नतीजे कम।
इसी संदर्भ में पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat की चेतावनियाँ आज सच होती दिख रही हैं।
हरीश रावत लगातार कहते रहे कि भाजपा सरकार के वादे घोषणाओं तक सीमित हैं,
और कार्रवाई की जगह घोटालों की परतें बढ़ती जा रही हैं।
आज वही तस्वीर साफ़ नज़र आती है—फाइलों में योजनाएँ, मैदान में मायूसी।
अभियोजन में देरी से अपराधियों के हौसले बढ़े,
कानून-व्यवस्था पर भरोसा डगमगाया,
और विकास के नाम पर पोस्टर-बैनर आगे रहे, काम पीछे।
पलायन, बेरोज़गारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी—इन सवालों पर सरकार की चुप्पी भारी पड़ रही है।
हरीश रावत का कहना था कि जनता को भ्रम नहीं, भरोसा चाहिए—
लेकिन भाजपा की राजनीति ने भरोसे की जगह नारे दिए।
आज हालात ऐसे हैं कि उत्तराखंड की जनता को समझ आ रहा है:
इस सरकार से उम्मीदें रखना, सिर्फ़ इंतज़ार बढ़ाना है।
