केदारनाथ रोपवे पर हरीश रावत के सवाल
हरीश रावत ने पूछा—क्या यह विकास पहाड़ के अनुकूल है?
उत्तराखंड की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र केदारनाथ आज एक नई बहस के केंद्र में है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि सोनप्रयाग से केदारनाथ धाम तक प्रस्तावित 12.9 किलोमीटर लंबा अत्याधुनिक रोपवे केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि पहाड़ के भविष्य से जुड़ा हुआ गंभीर फैसला है।
हरीश रावत ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस परियोजना को PPP मॉडल पर मंजूरी दी है और लगभग ₹4,081 करोड़ की इस योजना को अडानी एंटरप्राइजेज को सौंप दिया गया है, जिसके लिए उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी श्री केदारनाथ रोपवेज लिमिटेड का गठन भी कर दिया गया है।
सरकार इसे भारत का पहला 3S ट्राई-केबल रोपवे बता रही है, जो 8–9 घंटे की कठिन पैदल यात्रा को मात्र 36–40 मिनट में पूरा कर देगा।
लेकिन हरीश रावत का सवाल है—
सवाल यह नहीं है कि यात्रा कितनी तेज़ होगी, सवाल यह है कि इस “विकास” की कीमत कौन चुकाएगा?
उन्होंने कहा कि मार्च 2025 में परियोजना को मंजूरी, अप्रैल में फाइनेंशियल बिड और अगस्त में केंद्रीय कैबिनेट की हरी झंडी—पूरी प्रक्रिया असाधारण तेज़ी से आगे बढ़ाई गई।
लेकिन इस दौरान केदार घाटी के स्थानीय लोगों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों की चिंताओं को गंभीरता से सुना ही नहीं गया।
हरीश रावत के अनुसार, यह परियोजना भारतीय जनता पार्टी की उस नीति को दर्शाती है, जिसमें पहाड़ के संसाधन बड़े कॉरपोरेट्स को सौंप दिए जाते हैं और स्थानीय समाज को हाशिये पर छोड़ दिया जाता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि केदार घाटी भूकंपीय और भू-स्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील क्षेत्र है।
भारी मशीनरी, रोपवे के खंभे और टर्मिनलों के लिए होने वाला कटान ढलानों को और अस्थिर कर सकता है।
भूस्खलन, बाढ़ और आपदा का खतरा बढ़ेगा—और इसकी मार सबसे पहले स्थानीय गांवों पर पड़ेगी, न कि किसी कॉरपोरेट कंपनी पर।
हरीश रावत ने यह भी कहा कि रोपवे के खंभों और टर्मिनलों के लिए वनों की कटाई तय मानी जा रही है।
इससे जैव विविधता को नुकसान, जल स्रोतों पर दबाव और पारंपरिक चारागाहों का क्षरण होगा।
पहाड़ के लोग पहले ही पलायन, बेरोज़गारी और आपदाओं से जूझ रहे हैं—अब उनकी ज़मीन और जंगल भी “विकास” की भेंट चढ़ने वाले हैं।
उन्होंने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि रोपवे प्रति घंटे प्रति दिशा 1,800 यात्रियों को ले जाएगा—यानी रोज़ाना 18,000 से अधिक अतिरिक्त श्रद्धालु।
इतनी भीड़ का सीधा असर कचरा, शोर, प्रदूषण और अव्यवस्थित निर्माण के रूप में सामने आएगा।
केदारनाथ, जिसे सदियों से तपस्या और साधना की यात्रा माना गया, उसके एक हाई-फुटफॉल टूरिस्ट स्पॉट में बदलने का खतरा है।
रोज़गार के सरकारी दावों पर सवाल उठाते हुए हरीश रावत ने कहा कि परियोजना का निर्माण और 29 वर्षों का संचालन पूरी तरह कॉरपोरेट के हाथ में होगा।
स्थानीय घोड़ा-खच्चर संचालक, दुकानदार, छोटे होटल और गाइड—इन सभी की आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा।
लाभ जाएगा कंपनी को, नुकसान झेलेगा पहाड़।
अंत में हरीश रावत ने सरकार से कुछ बुनियादी सवाल रखे—
क्या केदारनाथ जैसे नाजुक और पवित्र क्षेत्र में कॉरपोरेट मॉडल सही है?
स्थानीय लोगों की सहमति और भविष्य की सुरक्षा की गारंटी कहाँ है?
क्या विकास का मतलब अब सिर्फ़ अडानी जैसे बड़े घरानों को ठेके देना रह गया है?
हरीश रावत के अनुसार, केदारनाथ रोपवे परियोजना केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की दिशा तय करने वाला फैसला है।
यह तय करेगा कि पहाड़ स्थानीय लोगों और प्रकृति के लिए बचेंगे—या कॉरपोरेट मुनाफे की केबल पर टंगते चले जाएंगे।
