हरीश रावत की सोच: सरकारें बदलें, योजनाएँ नहीं—उत्तराखंड की आत्मा को ठहराव नहीं चाहिए
नाम बदले जा सकते हैं, मगर गरीब का अनाज, गांव का पानी और पहाड़ का हक़ रुकना नहीं चाहिए—यही उत्तराखंडियत की असली नीति है
उत्तराखंड की राजनीति में सरकारें बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हरीश रावत हमेशा इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि सरकार बदलने का मतलब जनता की ज़रूरतों को रोक देना नहीं होता। उनके अनुसार, योजनाएँ किसी दल की नहीं होतीं—वे जनता की होती हैं, पहाड़ की होती हैं, और उत्तराखंडियत से निकलकर ज़मीन तक पहुँचती हैं। अगर नई सरकार को पुराने नाम पसंद नहीं हैं, तो नाम बदल दिए जाएँ, लेकिन योजनाओं की आत्मा और उनका प्रवाह रुकना नहीं चाहिए।
हरीश रावत की नीति-सोच में जल हमेशा केंद्र में रहा है। वे मानते रहे हैं कि उत्तराखंड सिर्फ़ पहाड़ों का राज्य नहीं, बल्कि भविष्य का जलशक्ति राज्य बन सकता है। इसी सोच से जल बोनस और जल संग्रहण से जुड़ी योजनाएँ शुरू की गई थीं। उनका साफ़ कहना रहा है कि अगर राज्य वर्षा की बूंदों का सिर्फ़ 25 प्रतिशत भी संग्रह कर ले, तो उत्तराखंड एक बड़ी आर्थिक और पर्यावरणीय ताकत के रूप में उभर सकता है।
लेकिन बाद की सरकारों ने इन योजनाओं को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें लगभग निष्क्रिय कर दिया। जल संग्रहण जैसे मूल विषय पर निरंतरता की जगह उपेक्षा देखने को मिली, और आज वही राज्य जल संकट से जूझ रहा है।
इसी तरह शुद्ध जल को लेकर भी हरीश रावत की सोच बिल्कुल स्पष्ट रही है—शुद्ध पानी केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की गारंटी है। उनके कार्यकाल में जल शुद्धता पर विशेष ज़ोर दिया गया, क्योंकि वे जानते थे कि गंदा पानी सबसे पहले गरीब की सेहत पर असर डालता है।
आज स्थिति यह है कि “हर घर नल” के नाम पर बजट तो खर्च हो गया, लेकिन कई जगह नल में पानी नहीं है, और जहाँ पानी है वहाँ उसकी शुद्धता सवालों के घेरे में है। इसका खामियाजा सीधे आम लोगों को अपने स्वास्थ्य से चुकाना पड़ रहा है।
खाद्य सुरक्षा के सवाल पर भी हरीश रावत की सोच कभी समझौतावादी नहीं रही। अन्न भाग्य योजना उनके लिए सिर्फ़ एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि गरीब परिवारों के लिए सम्मान की गारंटी थी। सब्सिडी पर अनाज, हर गरीब परिवार को हर महीने तय मात्रा में अनाज—यह भूख के खिलाफ़ एक ठोस सामाजिक सुरक्षा कवच था।
लेकिन सरकार बदलते ही ऐसी योजनाएँ कमजोर पड़ती गईं। सवाल यह है कि क्या गरीब की भूख, सरकार बदलने से खत्म हो जाती है?
हरीश रावत की सोच में असली विकास का मतलब नई घोषणाओं की होड़ नहीं, बल्कि नीतियों में निरंतरता है। उत्तराखंड को प्रयोगों की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि स्थिर, संवेदनशील और ज़मीन से जुड़ा शासन चाहिए। जहाँ योजना शुरू करने से ज़्यादा ज़रूरी होता है, उसे ईमानदारी से चलाते रहना।
आज उत्तराखंड के सामने सवाल साफ़ है—क्या हम केवल योजनाओं के नाम बदलते रहेंगे, या सच में जनता की ज़रूरतों को केंद्र में रखकर शासन करेंगे?
