UGC Equity Regulation 2026 पर सवाल—हरीश रावत ने BJP की नीति पर उठाए गंभीर संदेह
हरीश रावत बोले—“न्याय के नाम पर अविश्वास पैदा करना समझदारी नहीं”
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission) द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी रेगुलेशन 2026 को लेकर देशभर में जो हलचल मची है, उस पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि सरकार की मंशा चाहे समानता की हो, लेकिन इस तरह का नियम बनाना उसकी समझदारी में कमी को दिखाता है।
हरीश रावत के मुताबिक, समान अवसर और सामाजिक न्याय बेहद ज़रूरी हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का तरीका और ढांचा उतना ही अहम होता है। “अगर आप शिक्षा संस्थानों में ऐसे प्रावधान लाते हैं जिनमें अविश्वास की गुंजाइश ज़्यादा हो, तो आप अनजाने में पूरे सिस्टम को कम्पार्टमेंटलाइज़ कर देते हैं।
उनका तर्क है कि Equity Committee जैसे ढांचों का दायरा और संतुलन वाइड किया जा सकता था। “जब समिति का गठन सीधे जाति-आधारित पहचान पर होगा और उसमें सभी वर्गों के लिए बराबर प्रतिनिधित्व की स्पष्ट व्यवस्था नहीं होगी, तो शंका पैदा होना स्वाभाविक है,”। उनके अनुसार, नियमों में फर्जी शिकायत करने वालों के लिए सजा का अभाव एक बड़ी खामी है—“इससे शिकायतों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन जिन पर गलत आरोप लगेंगे, उनका करियर ब्लॉक हो जाएगा और उन्हें न्याय मिलने का रास्ता साफ़ नहीं दिखता।”
हरीश रावत ने चेताया कि शिक्षा संस्थानों में ऐसे कठोर और अस्पष्ट नियम लाने से प्रतिक्रिया बढ़ेगी। “आप अगर पहले से तनावग्रस्त शैक्षणिक माहौल में अविश्वास का बीज बो देंगे, तो उसका असर छात्रों, शिक्षकों और प्रशासन—तीनों पर पड़ेगा,”। उनका मानना है कि न्याय का रास्ता विश्वास से होकर जाता है, डर से नहीं।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार को चाहिए था कि वह परामर्श, स्पष्टता और संतुलन के साथ आगे बढ़ती—ताकि भेदभाव रोकने के साथ-साथ गलत इस्तेमाल की संभावना भी न्यूनतम रहे। “सिर्फ जाति के आधार पर संरचना खड़ी कर देना समाधान नहीं है; इससे नए सवाल खड़े होते हैं,”।
हरीश रावत की टिप्पणी सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी की नीति पर सवाल उठाती है। उनके मुताबिक, नीति निर्माण में संवेदनशीलता और दूरदर्शिता की कमी ही इस पूरे विवाद की जड़ है।
अंत में उन्होंने कहा—“देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को जोड़ने की ज़रूरत है, बाँटने की नहीं। अगर नियम लोगों को असुरक्षित महसूस कराएंगे, तो समानता का उद्देश्य भी उल्टा पड़ सकता है।”
इस पूरे विवाद में अब नज़रें अदालत और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। सवाल यही है—क्या सरकार नियमों में सुधार कर विश्वास बहाल करेगी, या यह टकराव और गहराएगा?
